हिंदुओं के खौफनाक कत्लेआम की कहानी है “लज्जा”

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इस किताब के बारे में लिखने से पहले एक बात लिखना चाहूंगा कि
“कोई भी व्यक्ति जन्म से सांप्रदायिक नहीं होता, लेकिन जब कुछ लोगों पर कट्टरपंथ का जुनून सवार होता है तो जाने अनजाने में उनका जवाब देते देते वह व्यक्ति कब सांप्रदायिक बन जाता है उसे खुद पता नहीं लगता”

लेखिका तस्लीमा नसरीन जी की किताब “लज्जा” पर बांग्लादेश में प्रतिबंध लगा दिया गया था। कारण था कि 1992 में जब हिंदुस्तान में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं का जिस तरह भयानक कत्लेआम हुआ, तस्लीमा नसरीन जी ने बिना किसी राग लपेट के उसका जस का तस विवरण लिख दिया। किताब की रूपरेखा में सुधामोय दत्ता और उनका परिवार है। सुधामोय दत्ता ने बांग्लादेश में हुई 1971 की जंग में अपना भरपूर योगदान दिया था और जब ईस्ट पाकिस्तान पाकिस्तान की बेड़ियों से आजाद होकर बांग्लादेश बना, तो उस खुशी में वह और उनकी पत्नी झूम उठे थे, लेकिन जल्द ही उन्हें पता लगा की मुश्किलें अभी खत्म नहीं हुई हैं और भयानक मुसीबतों की एक आंधी आनी बाकी है।

तस्लीमा नसरीन जी की यह किताब ‘क्लासिक’ है। मन ही मन में आप तस्लीमा जी की हिम्मत और हौसले की दाद देते हैं जिन्होंने बेखौफ होकर सत्ताधारी पार्टी की एक बेहद ही क्रूर कहानी के बारे में खुल करके बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी। किताब बताती है कि कैसे 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं को निशाना बनाया गया, उनके मंदिर तोड़ दिए गए, ना जाने कितनी लाखों-करोड़ों महिलाओं के रेप हुए और कितनी सारी इमारतों के नाम बदल दिए गए। किताब में सुधामोय दत्त और सुरंजन दत्त, इन पिता पुत्र के पात्रों के बहाने ऐसे कई सारे लोगों की जिंदगी के बारे में बयां किया गया है, जो हमेशा एक आदर्शवादी सोच रख कर आगे बढ़े लेकिन आखिरकार हालातों के सामने उनको अपने आदर्श और विचारधाराएं खोखली लगने लगी। सुरंजन दत्त का किरदार ऐसा किरदार है, जिससे बहुत सारे लोग खुद को जुड़ा हुआ महसूस करेंगे क्योंकि यह एक ऐसा किरदार है जो अपने कॉलेज के दिनों से ही राजनीति में दिलचस्पी रखता था और किसी भी धर्म में यकीन ना रखते हुए एक अच्छा इंसान बनना चाहता था लेकिन उसे एहसास होता है की वह चाहे कितना ही अच्छा इंसान बनने की क्यों ना ठान ले, लेकिन अपने धर्म के लोगों को मरता देख कर वह चुप नहीं रह पाएगा।

किताब का सबसे अच्छा चैप्टर वह लगता है जिसमें सुरंजन दत्त अपनी सारी किताबों में आग लगा देता है।यह आग लगाना कहीं ना कहीं इस बात का प्रतीक था कि सुरंजन को यह एहसास हो गया कि लाखों किताबें पढ़कर भी अपने धर्म के लोगों और अपनी बहन, दोनों को ही बचाने में सफल नहीं हो पाया।

किताब का मूल आधार है की धर्म, जिसका मकसद लोगों में प्यार और सौहार्द बांटना था,वह आज राजनैतिक पार्टियों का हथियार बन चुका है, ऐसा हथियार जिसके बल पर नेता अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते रहेंगे और विश्व भर में कत्लेआम होते रहेंगे।

Photo credit-Amazon

Sarthak Arora

सार्थक अरोड़ा ने विवेकानंद इंस्टिट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज़ से पत्रकारिता के विषय में अपनी ग्रेजुएशन पूरी की है व इस समय गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता के विषय में ही अपनी पोस्ट ग्रेजुएशन पूरी कर रहें हैं। किताबें व अखबार पढ़ने में इनकी विशेष रुचि रही है व राजनीति से संबंधित खबरों में बेहद दिलचस्पी रहती है। इससे पहले वे पंजाब केसरी ग्रुप व सोशल वायरल फीवर के लिए कंटेंट राइटर के तौर पर काम कर चुके हैँ। वर्तमान समय में सार्थक अरोड़ा एक्सप्रेस इंडिया न्यूज़ में संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।

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