महिला सशक्तिकरण की अनुपम मिसाल हैं अलंकृता नरूला

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अपनी रोजमर्रा की नौकरियों से तंग आकर कुछ हटकर करने का सपना तो हम सभी देखते हैं लेकिन उस सपने को साकार करने की हिम्मत हम में से बहुत कम लोग कर पाते हैं। एक पत्रकार के तौर पर मेरा हमेशा यह प्रयास रहा है कि ऐसे लोगों की कहानियों को सामने लाऊं। कुछ महीने पहले मेरी मुलाकात अलंकृता नरूला जी से हुई जो कि ‘बालाजी परांठे’ के नाम से अपना ठेला लगाती हैं। पेश है उनसे हुई बातचीत।

प्र.अलंकृता जी, मेरा पहला प्रश्न आपसे यह है की एक रोजमर्रा की नौकरी को छोड़ कर ‘बालाजी परांठे’ नाम से एक नया काम शुरू करने का विचार आपको कैसे आया और यह सफर कैसा रहा?
उत्तर-देखिए अगर मैं इस काम की बात करूं तो यह मेरा बचपन का सपना था। आप यूं कह सकते हैं की सातवीं कक्षा से ही मैंने सोचा था कि मैं एक ठेले की शुरुआत करूंगी जिस पर गरमा गरम परांठे बेचा करूंगी। इस पर अक्सर लोग यह सवाल किया करते थे कि तुम होटल या रेस्टोरेंट जैसा कुछ बड़ा सपना क्यों नहीं देखती। मुझे लगता है कि होटल या रेस्टोरेंट में खाना खिलाने के तरीके से ज्यादा अन्य चीजों पर ध्यान दिया जाता है जबकि आप ठेले पर लोगों को बहुत प्यार से खाना परोस सकते हैं। वह प्यार से खाना परोसने का तरीका और लोगों के साथ वह अपनापन, यह दो पक्ष ऐसे हैं जिनको एक ठेले पर ही लागू किया जा सकता है।
मैं मीडिया में एडवरटाइजिंग सेक्टर में भी कुछ समय तक रही लेकिन एक वक्त पर मुझे यह एहसास हुआ कि अब शायद जिंदगी को एक नई दिशा देने का वक्त है। मैं कुछ ऐसा करना चाहती थी जिसे करने के बाद रात को मैं सुकून की नींद सो सकूं। मेरा सपना वास्तव में तो एक ठेला लगाने का था। फिर एक दिन मैंने दृढ़ निश्चय के साथ एक निर्णय लिया और अपनी नौकरी को अलविदा कह कर अपना ठेले लगाने के सपने को साकार करने की ठान ली।

प्र.आमतौर पर जब इस तरह कोई अच्छी खासी नौकरी को छोड़कर कुछ अलग काम शुरू करता है तो घरवालों के साथ एक टकराव जरूर होता है। क्या आपको भी ऐसी किसी टकराव का सामना करना पड़ा?
उत्तर-मैं खुद को बहुत खुशनसीब समझती हूं कि मुझे ऐसे किसी भी टकराव का सामना नहीं करना पड़ा। मेरा परिवार एक मजबूत स्तंभ की तरह मेरे साथ खड़ा रहा।मेरा हमेशा एक चीज़ पर मानना रहा है कि अगर मैं कुछ करना चाहती हूं तो उसके लिए किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहूंगी। मैं उस सपने को साकार करने के लिए अपने दम पर पुरजोर कोशिश करती रहूंगी।

प्र.बालाजी परांठे की क्या स्पेशलिटी है?
उत्तर-बालाजी परांठे की स्पेशलिटी की बात करूं तो यहां का लच्छा परांठा लोग बहुत इंजॉय करके खाते हैं। इसके अलावा यहां का आलू पराठा और यहां की सब्जी भी लोगों को बहुत पसंद आती है। मेरा हमेशा यह मानना रहा है बालाजी परांठे के माध्यम से मैं लोगों को जो खाना खिलाने का काम कर रही हूं वह दुनिया का सबसे सर्वश्रेष्ठ काम है। जिस तरह गुरुद्वारे में बड़े प्रेम के साथ लोगों को लंगर खिलाया जाता है मैं पूरा पूरा प्रयास करती हूं की उसी प्रेम और सद्भाव के साथ मैं अपने ठेले के ग्राहकों को खाना परोस सकूं।

प्र.कोरोना काल के दौरान आपको किन दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है?
उत्तर-कोरोनावायरस के दौरान मुझे अपना ठेला बंद करना पड़ा क्योंकि लोग बाहर का खाना खाने में हिचक महसूस कर रहे थे। मैंने मार्च महीने के अंत तक अपना ठेला जरूर लगाया लेकिन उसके बाद कोरोनावायरस के बढ़ते मामलों को देख कर मुझे अपना ठेले पर विराम लगाना पड़ा।

प्र.क्या आने वाले वक्त में आप किसी इनफ्लुएंसर के साथ कोलैबोरेशन करना पसंद करेंगी?‌
उत्तर-मैं किसी के साथ कोलैबोरेशन करने में यकीन नहीं रखती। मैं सही मायनों में अपने ग्राहकों के साथ कोलैबोरेशन करने में यकीन रखती हूं।(हंसी) मैं वर्चुअल दुनिया के बनावटी पन से कोसों दूर रहना चाहती हूं।सभी फूड ब्लॉगर्स बहुत अच्छा काम कर रहे हैं लेकिन मेरा इतना मानना है कि अपने हाथ से खाना बनाकर दूसरे को खिलाने में एक अलग ही खुशी का अहसास होता है।

प्र.अलंकृता जी अगर आप को मौका दिया जाए तो दिल्ली में ऐसी कौन सी जगह है जहां के पराठे आप खाना पसंद करेंगी?
उत्तर-द्वारका सेक्टर 4 में राजू चूर चूर नान थाली का खाना मुझे अत्यधिक स्वादिष्ट लगता है। उनकी दुकान की प्रसिद्धि इस हद तक बढ़ गई थी कि उन्होंने द्वारका सेक्टर 11 और 12 में अपनी दो और दुकानें खोल ली। हालांकि अब शायद कुछ आर्थिक दिक्कतों की वजह से उन्हें अपनी एक दुकान बंद करनी पड़ी है। इसके अलावा मुझे अपनी मां के हाथ के परांठे बहुत पसंद है। वह बहुत ही लज़ीज़ पराठे बनाती हैं।

प्र.आखिरी सवाल अलंकृता जी, जो महिलाएं विवाह के पश्चात नई जिम्मेदारियों के आने पर अपने सपनों को पूरा करने पर विराम लगा देती हैं उनके लिए आप क्या कहना चाहेंगी?
उत्तर-मुझे लगता है कि वक्त के साथ अब इस सोच में बदलाव आ रहा है। लॉक डाउन के वक्त भी कई सारी महिलाएं वर्क फ्रॉम होम करती रही हैं।मैं यही कहूंगी कि अगर आपके मन में एक दृढ़ इरादा हो तो सब कुछ संभल जाता है। समय प्रबंधन भी एक व्यक्ति के जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण किरदार निभाता है। मिसाल के तौर पर आप एक कॉर्पोरेट लाइफ को ही ले लीजिए। आप एक समय पर ऑफिस जाते हैं, एक समय पर घर आते हैं और एक समय के बाद काम करना बंद कर देते हैं। ठीक किसी तरह अगर कोई समय प्रबंधन के साथ आगे बढ़े तो वह घर और अपने सपने, दोनों की तरफ पूरा पूरा समय दे सकता है। मैं “जहां चाह, वहां राह” के सिद्धांत पर चलने वालों में से हूं। मुझे लगता है कि अगर हम में कुछ कर दिखाने की तमन्ना और जज्बा हो तो हम हर काम को सफलतापूर्वक पूरा कर सकते हैं।

Sarthak Arora

सार्थक अरोड़ा ने विवेकानंद इंस्टिट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज़ से पत्रकारिता के विषय में अपनी ग्रेजुएशन पूरी की है व इस समय गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता के विषय में ही अपनी पोस्ट ग्रेजुएशन पूरी कर रहें हैं। किताबें व अखबार पढ़ने में इनकी विशेष रुचि रही है व राजनीति से संबंधित खबरों में बेहद दिलचस्पी रहती है। इससे पहले वे पंजाब केसरी ग्रुप व सोशल वायरल फीवर के लिए कंटेंट राइटर के तौर पर काम कर चुके हैँ। वर्तमान समय में सार्थक अरोड़ा एक्सप्रेस इंडिया न्यूज़ में संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।

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